पार्श्वनाथ- स्तवनं (मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज द्वारा रचित)


Posted on 15-Oct-2026 12:45 PM


वाराणसी श्रेष्ठ पुरे सुरूपे, वामाश्वसेन्स्य सूतः पवित्रः।

वरोग्रवंशे हरितांग जातः, पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।१।।

तू है काशी का निवासी, शाश्वत सुख राशि, मेरी आत्मा प्रभु है

तेरे दर्शनों की प्यासी, दुःख दारिद्र तू टाले, संकटो से निकाले

तेरा नाम ही सारी विपदाओं से बचा ले, तो बोलो हर दम

जय पारस... जय पारस... जय पारस...

य: संवरारि: शरणे हि यस्य, जित्वा च कर्मारि मनेकमेकं ।

विशुद्धजातो वर सिद्ध जातः पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।२।।

भद्रेश भद्राकृति भद्र कारं भद्रं न भद्रान् वरभद्रकारं

भद्रान् प्रियं भद्रक भद्र भावं पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।३।।

चिंतामणि तू हमारा, हमें तेरा ही सहारा, फंसी नैया जो भंवर में तो

तूने ही उबारा, नाग नागिन को तारा, दिया मंत्र नवकारा

मिले उसको सहारा, जपे नाम जो तिहारा, तो बोलो हर दम

जय पारस... जय पारस... जय पारस...

विधर्म दुर्मार्ग निवारकं य: सुमार्ग सद्धर्म विभासकम् य:

निजात्म तत्त्वं च निरुपकं तं पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।४।।

सुवर्ण शुभ्र त्रय छत्र युक्तश छत्रा श्रयो यस्य हिचेतनेषु

शुभानुकंपामय पापहारी पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।५।।

तू पहाड़ों के शिखर में, अवनी में अंबर में, सरिताओं में सागर में

तू बसा है चरा चर में, बहती हुई हवाए, काली काली ए घटाए

वृक्ष पुष्प लताएं, तेरी महिमा सुनाए, तो बोलो हर दम

जय पारस... जय पारस... जय पारस...

दयापरम् दिव्य दृढ़म सुदीप्तं सद्दी पनं सदद् मितं च दक्षम

सद्दे शकम् दृष्टि सुदर्शनीयं पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।६।।

यस्य स्वयंभू: श्रमणों गणेशः सुलोचना सद् गणनि: प्रधाना

सम्मेद शैलेश विमोक्ष जातः पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।७।।

विशुद्ध सम्पूर्ण गुणे: समृद्धों विशुद्ध संज्ञान दशा समृद्ध:

विशुद्ध चर्या विरदे: समृद्ध: पार्श्वम् हृदो में प्रणमामि पार्श्वम्।।८।।

तेरी भक्ति से ये मेरा, जीवन बदला है, मुझे जो कुछ मिला है

तेरे नाम से मिला है, मेरी प्रार्थना यही है, तेरी भक्ति ना छुटे

तेरे चरणों से दास का बंधन ना टूटे, तो बोलो हर दम

जय पारस... जय पारस... जय पारस...

पार्श्वभक्तिपरम् पूज्यं पठतु: भव्य! नित्यश:।

आदित्यानुष्ठितं स्तोत्रं लभतु परमं सुखं ।। ९।।